वर्तमान समय में व्यक्ति के सामने सबसे बड़ी समस्या है कि यदि वह गुरु धारण करना चाहे तो वह किसे गुरु बनाए ? उसकी सामर्थ्य और शक्ति का मापदंड कैसे निर्धारित किया जाए । वर्तमान में बड़ी संख्या में गुरु विद्यमान हैं और अधिकतर से धोखा ही धोखा है ऐसे हालात में क्या हम एक सच्चे और नेक गुरु को खोज पाएंगे ? कहते हैं कि हर समस्या का समाधान हमकों भगवान ने दिया हुआ है । परमात्मा का दिया समाधान है हमारे सद्ग्रन्थ, तो आइये जानते हैं कि हमारे सद्ग्रन्थों में पूर्ण गुरु की क्या परिभाषा बताई गई है । गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में गीता ज्ञान दाता ने तत्वदर्शी संत (सच्चा सतगुरु) की पहचान बताते हुए कहा है कि वह संत संसार रूपी वृक्ष के प्रत्येक भाग अर्थात जड़ से लेकर पत्ती तक का विस्तारपूर्वक ज्ञान कराएगा । वही पूर्ण संत/गुरु है । उसकी शरण में रहकर भक्ति साधना करने से ही साधक को मोक्ष की प्राप्ति हो सकती हैं । यजुर्वेद अध्याय 19 के मंत्र 25 व 26 में लिखा है कि वेदों के अधूरे वाक्यों अर्थात सांकेतिक शब्दों व एक चौथाई श्लोकों को पूरा करके विस्तार से बताएगा। वह तीन समय की पूजा बताएगा। सुबह पूर्ण परमात्मा की पू...